Punswan Sanskar - जानें क्या है पुंसवन संस्कार
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Punswan Sanskar - जानें क्या है पुंसवन संस्कार

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Punswan Sanskar - जानें क्या है पुंसवन संस्कार

सोलह संस्कारों का हमारे जीवन मे बहुत महत्व है। कहा जाता है की यह 16 संस्कार मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक रहते है। आज के समय मे लोग यह नहीं जानते की यह 16 संस्कार क्या है और इनका क्या महत्व है। इन 16 संस्कारों मे से हमने आपको गर्भ संस्कार की जानकारी दी थी। अब हम आपको पुंसवन संस्कार के विषय मे जानकारी देने जा रहे है। पुंसवन संस्कार मनुष्य जीवन के दूसरे चरण को दर्शाता है। यह संस्कार किसी भी गर्भवती महिला के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हालांकि आज के समय मे इस संस्कार का महत्व बहुत ही कम हो चुका है। इसीलिए हम आपको पुंसवन संस्कार के संबंधित सभी पहलुओ की जानकारी देंगे। 


कब करते है पुंसवन संस्कार


जैसा की हमने बताया की पुंसवन संस्कार गर्भवती महिलाओ के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। आम तौर पर गर्भधारण के 3 महीने बाद शिशु का मानसिक विकास शुरू हो जाता है। इसलिए गर्भधारण के तीन महीने बाद गर्भ मे पल रहे शिशु मे संस्कारों की नीव रखने के लिए पुंसवन संस्कार की विधि को किया जाता है। गर्भ मे तीन महीने रहने के बाद शिशु बहुत कुछ सीखने लग जाता है। पुंसवन संस्कार की विधि करने से शिशु हष्ट-पुष्ट रहता है। इसकी मदद से गर्भावस्था मे शिशु की रक्षा भी हो जाती है। 


पुंसवन संस्कार का महत्व


पुंसवन संस्कार को शिशु और गर्भवती महिला की अच्छी सेहत की कामना के लिए किया जाता है। कहा जाता है की जिस कर्म से गर्भस्थ जीव पुरुष बनता है, वो ही पुंसवन संस्कार कहलाता है। गर्भावस्था के 3 माह तक शिशु का लिंग भेद नहीं हो पाता है, इसलिए लड़की या लड़के के लिंग की उत्पत्ति के लिए भी पुंसवन संस्कार की विधि कारवाई जाती है। हमारे शास्त्रों और धर्मग्रंथों के अनुसार पुंसवन संस्कार करने के दो मुख्य उद्देश्य होते है। 


पहला उद्देश्य पुत्र प्राप्ति के लिए होता है और दूसरा उद्देश्य सुंदर, गुणवान और स्वस्थ संतान प्राप्ति के लिए होता है। आमतौर पर इस संस्कार के अनुष्ठान का पालन वे लोग करते है जिन्हे पुत्र प्राप्ति की कामना होती है। इस संस्कार की मदद से गर्भ मे पल रहे शिशु की अच्छी सेहत की कामना की जाती है। धार्मिक ग्रंथ जैसे सुश्रुतसंहिता, यजुर्वेद आदि मे पुंसवन संस्कार को पुत्र प्राप्ति से भी जोड़ा जाता है। सुश्रुतसंहिता, यजुर्वेद आदि मे लिखा गया है की “गर्भाद् भवेच्च पुंसूते पुंस्त्वस्य प्रतिपादनम्” यानिकी गर्भस्थ शिशु पुत्र के रूप मे जन्म ले इस बात की कामना करते है। 



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पुंसवन संस्कार की विधि


पुंसवन संस्कार की विधि को छह अनुष्ठानों मे बाटा गया है जो की ओषधि अवघ्राण, गर्भ पूजन, अश्रावस्तना, विशेष आहुति, चरु प्रदान और आशीवर्चन है। 


औषधि अवघ्राण: इस संस्कार की शुरुआत में एक विशेष प्रकार की औषधि गर्भवती महिला की नासिका छिद्र से उनके शरीर में पहुंचाई जाती है। इस विधि के दौरान गिलोय वृक्ष की लकड़ी से कुछ बूंद रस निकाल कर गर्भवती महिला की नासिका छिद्र में पहुचाय जाता हैं। साथ ही एक विशेष मंत्र का उच्चारण किया जाता है। 


“ॐ अदभ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च, विश्वकर्मणः संवर्त्तताग्रे। तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति, तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे। “


गिलोय की लकड़ी से निकला हुआ रस महिला के शरीर को कीटाणुरहित एवं रोग नाशक बनाता है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले मंत्र उच्चारण के दौरान गर्भवती स्त्री को अपने दाहिने हाथ से गिलोय की इस औषधि को अपनी नासिका के ऊपर लगा कर स्वास लेनी चाहिए। साथ ही शिशु के पिता सहित परिवार के अन्य सदस्य भी मंत्र उच्चारण करके गर्भवती महिला के पेट पर हाथ रखे एवं इस औषधि अवघ्राण की प्रक्रिया को संपन्न करते हैं।


गर्भ पूजन: कहा जाता है कि शिशु ईश्वर का रूप होता है इसीलिए गर्भवती महिला के गर्भ को पूजनीय माना जाता है क्योंकि माता के गर्भ से ईश्वर रूपी शिशु इस संसार का हिस्सा बनता है। गर्भ में पल रहे शिशु को संस्कारित करने के लिए माता-पिता सहित सपरिवार विशेष उपासना करते हैं। इस अवधि के दौरान गर्भवती महिला का सेहतमंद भोजन ग्रहण करना एवं पूर्ण रूप से आराम करना आवश्यक है। कहा जाता है कि यदि गर्भवती महिला प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें तो भगवान उसकी संतान पर आशीर्वाद बनाए रखते हैं। इसी कारणवक्ष पुंसवन संस्कार के अनुष्ठान की अवधि के दौरान गर्भ पूजन की प्रक्रिया को किया जाता है। इस अनुष्ठान में गर्भवती स्त्री के परिवार एवं परिजन हाथ में फूल एवं अक्षत लेकर मंत्र उच्चार करके शिशु के अच्छे सेहत एवं सौभाग्य की कामना करते हैं। मंत्र उच्चारण कुछ इस प्रकार है। 


ॐ सुपर्णोसि गुरुत्माँस्त्रिवृते शिरो, गायत्रं चक्षुबृहद्रथन्तरे पक्षौ। स्तोम आत्मा छंदा स्यढाणि यजु षि नाम। साम ते तनूर्वामदेव्यं, यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः। सुपर्णोसि गरुत्मान दिवं गच्छ स्वः पत। 


इसके बाद सभी फूल एवं अक्षतो को गर्भवती महिला के हाथ में रखा जाता है एवं स्त्री को फूलों का स्पर्श अपने पेट से लगाकर वापस रखना चाहिए। 


अश्रावस्तना: पुंसवन संस्कार के दौरान गर्भ में पल रहे शिशु के शारीरिक विकास के लिए कामना करने हेतु इस अनुष्ठान को किया जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान परिवार के सदस्य देवी देवताओं से प्रार्थना करते हैं कि जिस जिम्मेदारी से उन्होंने इस शिशु को संसार में भेजा है उसी प्रकार इसका निर्वहन पूरी श्रद्धा से करें। इस अनुष्ठान के दौरान गर्भवती स्त्री को यह आश्वासन देना चाहिए कि ना वह केवल अपने खान-पान का संपूर्ण ध्यान रखेगी बल्कि गर्भ में पल रहे अपने शिशु को अच्छे संस्कार देने का भरपूर प्रयास करेगी। साथ ही स्त्री को यह भी आश्वासन देना होता है कि गर्भावस्था के समय है किसी भी प्रकार की ईर्ष्या, क्रोध, दोष या अन्य प्रकार के विकारों से खुद को दूर रखे एवं अपने शिशु के उज्जवल भविष्य की कामना करे। वहीं दूसरी ओर पिता एवं परिवार द्वारा भी आश्वासन लिया जाता है कि गर्भ में पल रहे शिशु को सभी प्रकार की सामाजिक कुरीति से दूर दूर रखेंगे। अनुष्ठान के दौरान माता को अपना दाहिना हाथ अपने पेट पर रखना होगा और साथ ही परिवार एवं पिता को भी अपना दाहिना हाथ गर्भवती स्त्री के पेट पर रखते मंत्र उच्चारण करना होगा। 


ॐ यत्ते सुशीमे हृदये हितमन्तः प्रजापतौ। मन्येहं मां तद्विद्वांसं, माहं पौत्रमघनिन्याम।


विशेष आहुति: पुंसवन संस्कार के अनुष्ठान को पूरा करने के लिए विशेष आहुति का आयोजन किया जाता है। किसी भी अनुष्ठान या पूजा के समय यज्ञ करवाना आवश्यक होता है एवं यज्ञ करवाने हेतु विभिन्न प्रकार की आहुति दी जाती है। पुंसवन संस्कार के दौरान आहुति के लिए घर में चावल की खीर बनाई जाती है एवं इसका इस्तेमाल यज्ञ में आहुति देने के लिए किया जाता है। यज्ञ के दौरान माता पिता एवं परिवार के सदस्य गायत्री मंत्र का जाप करते हैं। साथ ही नीचे दिए हुए मंत्र का उच्चारण करके खीर की पांच आहुतियां देते है। च


ॐ धातादधातु दाशुषे प्राचीं जीवतुमक्षिताम। वयं देवस्य धीमहि सुमतिं वाजिनीवतः स्वाहा। इदं धात्रे इदं न मम। “


चरु प्रदान: यज्ञ में प्रयोग की गई भोजन सामग्री को दिव्य शक्ति से पूर्ण माना जाता है इसीलिए इस अनुष्ठान के दौरान विशेष आहुति के लिए बनाई गई खीर को गर्भवती महिला को दिया जाता है। आहुति के बाद गर्भवती महिला को यज्ञ में बचा हुआ प्रसाद ग्रहण करवाया जाता है क्योंकि गर्भवती स्त्री के लिए सात्विक भोजन करना अत्यंत आवश्यक है। पुंसवन संस्कार के तहत गर्भवती स्त्री को वही भोजन ग्रहण करवाया जाता है जो कि पहले ईश्वर को समर्पित किया गया हो। चरू प्रदान अनुष्ठान के दौरान आहुति में इस्तेमाल की गई खीर को सबसे पहले गर्भवती स्त्री को दिया जाता है उसके बाद सभी परिवार के सदस्यों को प्रसाद के रूप में खिलाया जाता है। गर्भवती महिला को इस मंत्र का उच्चारण करते हुए खीर को मस्तक पर लगाना होता है एवं भगवान का आशीर्वाद मांगना होता है।


ॐ पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम।


आशीर्वचन: पुंसवन संस्कार की समाप्ति के दौरान इस क्रिया को आयोजित किया जाता है। सभी क्रियाएं समाप्त होने के बाद  परिवार के बड़े बुजुर्ग एवं पुरोहित गर्भवती महिला के आंचल में फल फूल डालते है तथा स्त्री भी उन फल फूलों को श्रद्धा पूर्वक स्वीकार करे एवं अपने पति के साथ सभी बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद ले। अंत में गर्भवती महिला पर पुष्प वर्षा की जाती है। इसी के साथ पुंसवन संस्कार का आयोजन समाप्त हो जाता है।


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