ज्योतिष में माता पिता और बच्चों के बीच संबंध
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ज्योतिष में माता पिता और बच्चों के बीच संबंध

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ज्योतिष में माता पिता और बच्चों के बीच संबंध

Parent child relationship astrology - ज्योतिष में माता पिता और बच्चों के बीच संबंध

Medical science की माने तो बच्चों का व्यवहार बहुत कोमल होता है। हम बच्चों को जिस प्रकार की संस्कार, मूल एवं भावना सिखाते है उसका प्रभाव उनके सम्पूर्ण जीवन मे रहता है। साइक्लॉजीकल रिसर्च द्वारा यह पुष्टि की गई है की बच्चों के व्यवहार का मूल रूप उनकी पूरी जिंदगी मे एक समान राहत है। माता और पिता का भी एक व्यवहार है जिसके साथ बच्चों का जन्म होता है। माता पिता का व्यवहार भिन्न होता है इसी वजह से बच्चों के अंदर आंतरिक रूप मे भिन्न प्रकार के व्यवहार उत्पन्न होते है। अधिकांश यह देखा गया है की माता पिता संतान के साथ अपने संबंध को लेकर चिंतित रहते है। इसलिए ज्योतिष शास्त्र की मदद से हम आपको माता पिता और बच्चों के बीच संबंध की जानकारी देंगे।

ज्योतिष मे माता पिता और संतान के बीच संबंध

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार संतान की कुंडली/birth chart की मदद से हम यह जान सकते है की माता पिता का रिश्ता कैसा है। यदि सही समय पर हम इस बात का उल्लेख कर पाए तो हम रिश्ते मे आ रही समस्या का समाधान प्राप्त कर सकते है। बर्थ चार्ट मे कई ऐसे भाव है जो की माता पिता के रिश्ते का वर्णन करते है। संतान के अंदर सकारात्मक मानसिकता पैदा करने हेतु बच्चे और माता पिता के बीच सकारात्मक व्यवहार होना आवश्यक है। आइए अब हम ज्योतिष शास्त्र की मदद से माता पिता और उनकी संतान के बीच के रिश्ते का वर्णन करते है।

1.  यदि संतान का जन्म नक्षत्र पिता के जन्म नक्षत्र से मेल खाता हो या उसका जन्म चंद्र व्यय मे हुआ है तो जातक को संतान के कारण मानसिक तनाव एवं पीड़ा का सामान्य करना पड़ता है।

2.  नक्षत्र का आपके निजही जीवन पर प्रभाव पड़ता है।

3.  यदि संतान पिता के चंद्र लग्न मे जन्म लेता है या फिर पिता का चंद्रमा संतान के चौथे भाव मे तो संतान और पिता की सोच मेल नहीं खाती।

4.  यदि यह योग संतान के नौवे भाव मे हो तो यह संतान का पिता के समक्ष घोर विरोश का इशारा करता है।

5.  लग्नेश एवं पंचमेश भाव का योग बनने पर जातक को आज्ञाकारी संतान की प्राप्ति होती है। लग्नेश एवं पंचमेश के मेल से आज्ञाकारी संतान मिलता है।

6.  यदि लग्नेश पंचमेश भाव मे हो या पंचमेश लग्नेश भाव मे हो तो जातक का संतान उनका सम्मान करेगा। 

7.  इस योग के बनने से संतान भविष्य मे अच्छा व्यक्तव्य वाला व्यक्ति बंता है।

8.  पंचम भाव संतान या पिता बनने के भाव को दर्शाता है।

9.  यदि पंचम भाव मे गुरु कारक भाव मे हो तो इससे पिता बनने के बाद जीवन मे अनगिनत सुख प्राप्त होते है।

10. यदि सूर्य और नवमेश भाव की दृष्टि गुरु पर हो तो इससे पिता को सर्वप्रथम सुख प्राप्त होता है।

11. अगर किसी क्रूर ग्रह और पंचमेश का संगम या पंचमेश और नवमेश के निचले भाव मे राहू विराजमान है तो इससे पिता को संतान की वजह से कष्ट हो सकता है।


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ज्योतिष अनुसार पिता का अपने संतान पर पड़ने वाले प्रभाव

  यदि संतान की जन्मकुंडली मे सूर्य मजबूत स्तिथि मे हो इससे पिता का व्यवहार संतान के अंदर आता है।

  संतान की कुंडली मे चंद्र इस बात का प्रतीत है की संतान का व्यवहार उन्हे अपनी माँ से मिलता है।

  जिस ग्रह मे सूर्य त्रिदेव होते है उससे संतान की कुंडली मे अलग अलग गुण दोष होते है।

  स्वाभाविक रूप से बच्चे जिज्ञासु होते है इसलिए उन्हे पढ़ना पसंद है। सीखने की एक स्पष्ट समय सीमा होती है जो की समय के साथ उग्र होती है।

ज्योतिष अनुसार माता और संतान का संबंध

  ज्योतिष अनुसार चौथे तिमाही, चतुर्थ भाव, और चंद्रमा का शुभ साहियोग जातक के जीवन के लिए बहुत सकारात्मक माना गया है। ऐसी संतान अपनी मां को सम्मान देती है ।

  यदि संतान की कुंडली मे लग्न भाग या त्रिकोण मे चतुर्थ भाव हो और यह शुभ ग्रहों के साथ शुभ भाव मे विराजित हो तो ऐसे मे संतान का अपनी मां के प्रति सम्मान एवं आत्मीयता का भाव उत्पन्न होता है।

  यदि लग्नेश और चतुर्थेश भाव मे मित्रता हो और शुभ ग्रहों के साथ संबंध दूरदर्शी हो तो ऐसे मे जातक अपनी मां का सम्मान करता है।

  संतान के चौथे भाव मे शुभ साहियोग जातक को आशीर्वाद के रूप मे मां का सुख देता है।

  संतान की कुंडली के केंद्र चतुर्थ लग्न भाव और शुभ ग्रह जैसे बुध, सूर्य, शुक्र, आदि के बीच सकारात्मक संबंध होने से जातक को मां का प्यार नसीब होता है।

  जातक की कुंडली मे मंगल और गुरु के बीच संबंध होने से जातक माँ का सम्मान करता है और उनकी हर बात मानता है।

प्रतिकूल संबंध के लिए ज्योतिष संयोजन

  संतान की जन्मकुंडली मे छठे भाव के स्वामी और लग्न भाव के स्वामी अगर नवमं भाव मे विराजित हो तो इससे शुभ संयोजन बंता है।

  यदि सूर्य बारहवें या नौवे भाव मे हो तो इससे शुभ संयोजन बंता है।

  यदि लग्न के स्वामी बारहवें भाव मे हो तो इससे शुभ संयोजन बंता है।

  यदि कुंडली मे लग्न के स्वामी और ब्रहस्पति मे शुक्र का छठे भाव से संयोजन हो तो यह शुभ माना जाता है

  यदि ब्रहस्पति पांचवे भाव मे विराजित हो तो यह पीड़ित योग कहलाता है।


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