Jagannath Rath Yatra 2022 - क्यों निकाली जाती है जगन्नाथ रथ यात्रा
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Jagannath Rath Yatra 2022 - क्यों निकाली जाती है जगन्नाथ रथ यात्रा

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Jagannath Rath Yatra 2022 - क्यों निकाली जाती है जगन्नाथ रथ यात्रा

Jagannath Rath Yatra 2022 - क्यों निकाली जाती है जगन्नाथ रथ यात्रा, जाने इसका इतिहास और महत्व 


भारत के उड़ीसा राज्य के पुरी क्षेत्र मे स्थित जगन्नाथ मंदिर जिसे शंख क्षेत्र और श्री क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, वह भगवान जगन्नाथ जी की मुख्य लीला भूमि है। पुरी क्षेत्र मे वैष्णव धर्म की मान्यता है की भगवान श्री जगन्नाथ जी की युगल मूर्ति भगवान श्री कृष्ण और राधा की प्रतीक है। श्री जगन्नाथ समूचे संसार मे इस पवित्र रूप मे ही पूजे जाते है। माना जाता है की भगवान श्री जगन्नाथ भगवान श्रीकृष्ण की कला का एक रूप हैं। इस मान्यता का उल्लेख श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य पंच सखाओं मे हैं। भगवान श्री जगन्नाथ  जी की रथयात्रा आषाढ़ मास की शूलपक्ष की द्वितीय तिथि पर आरंभ की जाती है। यह रथ यात्रा पुरी क्षेत्र का एक प्रधान पर्व है जिसमे भाग लेने के लिए और भगवान श्री जगन्नाथ के दर्शन के लिए प्रति वर्ष लाखों की संख्या मे अनुयायी देश के कोने कोने से आते है। 


जगन्नाथ रथ यात्रा का धार्मिक महत्व 

पुरी क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण भाग यह मंदिर है जिसमें भगवान जगन्नाथ विराजमान है। मान्यताओं के मुताबिक इस मंदिर को कबीर परमात्मा ने डूबने से बचाया था। कथाओं के मुताबिक समुद्र भगवान श्री कृष्ण जी से त्रेता युग का बदल लेने के लिए इस मंदिर को डुबाना चाहते थे। परंतु जब परमात्मा कबीर को इस वाक्य का पता चल तब उन्होंने काल को वचन दिया की वे इस मंदिर को डूबने से बचाएंगे।


इस मंदिर की मूर्ति, स्थापत्य कला और समुद्र का दिल छू लेने वाला किनारा लाखों पर्यटकों को काफी आकर्षित करता है। शास्त्रों मे भी भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा के महत्व के बारे मे वर्णन किया गया है। स्कन्द पुराण मे बताया गया है कि जो व्यक्ति इस रथ यात्रा मे जगन्नाथ जी के नाम का कीर्तन करते हुए गुंडीचा नगर तक जाता है वे पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। स्कन्द पुराण मे इस बात का भी जिक्र है कि जो व्यक्ति रथ यात्रा मे जगन्नाथ भगवान के दर्शन करते हुए प्रणाम करे और रास्ते की धूल मिट्टी मे लोट लोट कर रथ यात्रा पुरी करता है उसे मृत्यु के बाद सीधा भगवान विष्णु के उत्तम धाम के दर्शन होते है। जो अनुयायी रथ मे विराजमान भगवान श्री कृष्ण, सुदामा और सुभद्रा के दर्शन दक्षिण दिशा की ओर देखकर करते है उन्हे मोक्ष की प्राप्ति होती है। सब मनिसा मोर परजा अर्थात सब मनुष्य मेरी प्रजा है। रथ यात्रा एक ऐसा पर्व है जिसमे भगवान जगन्नाथ मंदिर से निकलकर भक्तों के बीच मे आते है और उनके संकटों को हर लेते है। 


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जगन्नाथ रथ यात्रा का कार्यक्रम


  • 01 जुलाई 2022 शुक्रवार- रथ यात्रा का प्रारंभ (गुंडीचा मौसी के घर जाने की परंपरा)

  • 05 जुलाई 2022 मंगलवार- हेरा पंचमी (5 दिन जगन्नाथ भगवान गुंडीचा मंदिर मे वास करते है)

  • 08 जुलाई 2022 शुक्रवार- संध्या दर्शन (जो भक्त इस दिन जगन्नाथ के दर्शन करता है उन्हे 10 साल तक श्रीहरी की आराधना के समान फल मिलता है)

  • 09 जुलाई शनिवार - बहुदा यात्रा (भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा की घर वापसी)

  • 10 जुलाई रविवार - सुनाबेसा (इस अवधि मे मंदिर मे पुनः विराजमान होने के बाद भगवान अपना शाही रूप लेते है)

  • 11 जुलाई सोमवार - आधार पना (दिव्य रथो पर एक पना चड़ाया जाताहै जिसमे पनीर, चीनी, मेवा और दूध से बना है)

  • 12 जुलाई मंगलवार - नीलाद्री बीजे (रथ यात्रा का सबसे दिलचस्प अनुष्ठान) 


जगन्नाथ मंदिर की 1100 साल पुरानी रसोई 

जगन्नाथ रथ यात्रा के समय लाखों श्रद्धालुओ के लिए प्रसाद बनाया जाता है। इस मंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोई है जहाँ प्रतिदिन लगभग 1 लाख लोगों के लिए खाना बनाया जाता है। जगन्नाथ मंदिर की रसोई का निर्माण 11 वी शताब्दी के समय हुआ था। उस समय पुरानी रसोई मंदिर के दक्षिण भाग में थी। कम जगह के कारण 1682 से 1713 के बीच राजा दिव्य सिंहदेव ने इस रसोई को बंद करके नई रसोई का निर्माण कराया। मौजूदा समय मे भी उसी रसोई का इस्तेमाल करके भगवान को हर दिन 56 तरह के पकवान का भोग लगाया जाता है। जगन्नाथ मंदिर मे दिन मे 6 बार 240 चूल्हों पर भोजन बनाया जाता है जिसमे प्रतिदिन 500 हलवाई करीब 1 लाख लोगों के लिए भोजन बनाते है। यह रसोई मंदिर के दक्षिण दिशा मे स्थित है। रसोई में मिट्टी की 700 छोटी छोटी हांडियों के इस्तेमाल से भोग बनाया जाता है। रसोई मे रोज 56 भोग और 10 प्रकार की मिठाइयां बनाई जाती है। इस रसोई की देखरेख ब्राह्मण परिवार के 800 सदस्यों द्वारा की जाती है जो की कई पीढ़ियों से इस मंदिर मे भोजन बना रहे है।


कब निकाली जाती है रथ यात्रा

हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की द्वितीय तिथि को भगवान जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा की शुरुआत होती है। इस रथ यात्रा मे भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ रथ मे विराजमान होकर यात्रा करते है और भक्तों को अपने दिव्य दर्शन देते है। 


क्यों निकाली जाती है रथ यात्रा

श्री जगन्नाथ भगवान की रथ यात्रा से जुड़ी कई कथा और मान्यताए है। कहा जाता है की एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे द्वारका के दर्शन कराने का आग्रह किया। तब अपनी बहन की इच्छा पुरी करने के लिए भगवान जगन्नाथ रथ मे विराजमान होकर अपनी बहन को पूरे नगर का भ्रमण कराया था। तभी से ही इस रथ यात्रा की शुरुआत हुई थी। इस रथ यात्रा के महत्व के बारे मे नारद पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण मे भी वर्णन किया गया है। मान्यताओं के जो भी व्यक्ति रथयात्रा मे शामिल होकर भगवान जगन्नाथ के रथ को खीचता है उसे सौ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। 


कैसे निकलती है रथ यात्रा 

रथ यात्रा की शुरुआत बलभद्र जी के रथ से होती है। उनका पावन रथ तालध्वज के लिए प्रस्थान करता है। इसके बाद सुभद्रा के पद्म रथ की यात्रा प्रारंभ होती है। अंत में भगवान जगन्नाथ जी के रथ ‘नंदी घोष’ को भक्तों द्वारा बड़ी बड़ी रस्सियों की मदद से खीचा जाता है। रथ यात्रा पुरी करने के बाद जगन्नाथ भगवान अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर गुंडीचा मंदिर जाते है जो की मुख्य मंदिर से करीब ढाई किलोमीटर दूर है। यहा सात दिन विराजित होने के बाद आठवें दिन फिर मुख्य मंदिर मे लौट जाते है। जगन्नाथ रथ यात्रा का उत्सव कुल 9 दिन का होता है। 


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रथ से जुड़े कुछ रोचक तथ्य 

रथ यात्रा मे इस्तेमाल किए जाने वाले तीन रथ पुरी तरह से लकड़ी से बने होते है जिन्हे श्रद्धालुओ द्वारा खीचा जाता है। भगवान जगन्नाथ जी के रथ मे कुल 16 पहिये लगे होते है, उनके भाई बलराम के रथ मे 14 और बहन सुभद्रा के रथ मे 12 पहिये लगे होते है।


भगवान जगन्नाथ का रथ: भगवान जगन्नाथ जी के रथ को गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदिघोष आदि के नाम से जाना जाता है जिसमे कुल 16 पहिये होते है और यह रथ 13 मीटर ऊंचा होता है। 


बलभद्र का रथ: बलराम जिन्हे बलभद्र के नाम से भी जाना जात है उनके रथ का नाम तालध्वज है। यह रथ महादेव जी का प्रतीक है। इस रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मातलि है। इस रथ के ध्वज को उनानी कहा जाता है। 


सुभद्रा का रथ: सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है। इस रथ को देवी दुर्गा का प्रतीक माना जाता है। इस रथ के रक्षा जयदुर्गा और सारथी अर्जुन है। इस रथ के ध्वज को नदंबिक के नाम से जाना जाता है। 


रथ यात्रा की कहानी 

रथ यात्रा से जुड़ी कई कथाओ के बारे मे वर्णन है। रथ यात्रा के पीछे एक पुरानी कहानी प्रचलित है जिसके मुताबिक ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ का जन्म हुआ था। उसी दिन भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई और बहन को रत्नसिंहासन से उतारकर मंदिर के पास बने स्नान मंडप मे ले जाया गया था। इसके बाद भगवान जगन्नाथ जी को 108 कलशों से शाही स्नान कराया गया था जिसके कारण वे बीमार पड़ गए थे। इसके पश्चात उन्हे एक विशेष स्थान पर रखा गया जीसे ओसर घर कहते थे। 15 दिन के बाद भगवान जगन्नाथ स्वस्थ हो गए और भक्तों को दर्शन देने लगे। इसे नवयौवन नेत्र के नाम से भी जाना जाता है। इसके बाद भगवान जगन्नाथ बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकल गए। 


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