सोलह संस्कारों मे से छठा संस्कार है निष्क्रमण संस्कार, जाने क्या है महत्व
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सोलह संस्कारों मे से छठा संस्कार है निष्क्रमण संस्कार, जाने क्या है महत्व

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सोलह संस्कारों मे से छठा संस्कार है निष्क्रमण संस्कार, जाने क्या है महत्व

निष्क्रमण संस्कार - सोलह संस्कारों मे से छठा संस्कार है निष्क्रमण संस्कार, जाने क्या है महत्व 


मानव जीवन मे कुल 16 संस्कार होते है। हर संस्कार मनुष्य जीवन के अलग अलग चरणों को दर्शाते है। इन संस्कारों का मानव जीवन मे बहुत महत्व है। यह सोलह संस्कार हमे संस्कृति, गुण और कर्म करने की शिक्षा देते है। इन संस्कारों का प्रारंभ गर्भ संस्कार से होता है, अतः अंत अंत्येष्टि संस्कार से होता है। इससे पहले हमने आपको सोलह संस्कार मे से पांच संस्कारों की जानकारी दी है। यह पांच संस्कार गर्भधारण से लेकर नामकरण तक होते है।


नामकरण संस्कार पांचवा संस्कार है जो की बच्चे के जन्म के बाद किया जाता है। अब हम आपको छठे संस्कार यानिकी निष्क्रमण संस्कार की जानकारी देंगे। यह संस्कार तब किया जाता है जब शिशु को पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है। निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। आइये जानते है की निष्क्रमण संस्कार का क्या महत्व है और इस संस्कार को कैसे किया जाता है।


क्या है निष्क्रमण संस्कार 


निष्क्रमण संस्कार एक संस्कार है जब बच्चे को पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है। निष्क्रमण संस्कार एक महत्वपूर्ण वैदिक संस्कार है जो एक नवजात शिशु से जुड़ा होता है और जब बच्चे को पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है। यह रिवाज आमतौर पर बच्चे के जन्म के चौथे महीने में किया जाता है, जब बच्चे की सभी इंद्रिय अंग सूर्य, हवा आदि को सहन करने के लिए पर्याप्त मजबूत हो जाती हैं।


निष्क्रमण के दिन प्रांगण में एक वर्गाकार क्षेत्र जहाँ से सूर्य दिखाई देता है, उस पर गोबर और मिट्टी का लेप किया जाता है और उस पर स्वास्तिक का चिन्ह अंकित किया जाता है। बच्चे की माँ उसके ऊपर चावल के दाने बिखेर देती है। बच्चे को लाया जाता है। समारोह कोई समाप्ति तब होती है जब पिता बच्चे को शंख की ध्वनि और वैदिक भजनों के जाप के साथ सूर्य की ओर दिखाया जाता है। बच्चे के माता-पिता पंचभूत (5 तत्व) - पृथ्वी, जल, अंतरिक्ष, वायु और अग्नि का आह्वान करते हैं। इस अनुष्ठान मे सूर्य (सूर्य देव) और चंद्र (चंद्रमा देवता) की पूजा भी की जाती है। फिर बच्चे को सूरज और बाद में रात में पहली बार चाँद दिखाया जाता है।



इन अनुष्ठानों का उद्देश्य शिशु को सूर्य, चंद्रमा और अन्य देवी देवताओं का आशीर्वाद प्रदान करना और जीवन देने वाले सूर्य से जीवन शक्ति के वरदान के लिए प्रार्थना करना है। इस अनुष्ठान की मदद से प्राकृतिक शक्तियों के लिए बच्चे में अंतर्मानं मे सम्मान की भावना पैदा होती है। ये माता-पिता को यह भी सिखाते हैं कि वे अपने बच्चे को अपने घर की दीवारों के भीतर न बांधें, बल्कि उसे खुले आसमान में सांस लेने दें।



निष्क्रमण संस्कार का महत्व 


मनुष्य के जीवन मे किए जाने वाले सभी संस्कारों का बहुत महत्व है। इन संस्कारों के अनुष्ठानों को करने का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को जीवन मे सद्गुणों का संचार करना है। निष्क्रमण संस्कार की मदद से शिशु के बेहतर स्वास्थ्य की कामना की जाती है। यह संस्कार आध्यात्मिक रूप से जुड़ा हुआ है। निष्क्रमण संस्कार का अनुष्ठान शिशु के बेहतर स्वास्थ्य और उनकी दीर्घायु की कामना करने के लिए किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों मे भी इस बात का वर्णन है:


“निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युदृष्टा मनीषिभि:”


निष्क्रमण संस्कार कब किया जाता है?


शिशु के जन्म के चौथे माह मे निष्क्रमण संस्कार का अनुष्ठान किया जाता है। शिशु के घर मे जन्म लेते ही सूतक लग जाता है और जन्म के 11 वे दिन नामकरण संस्कार का अनुष्ठान किया जाता है। कुछ लोग जन्म के 100 वे दिन या 1 वर्ष बाद भी नामकरण संस्कार के अनुष्ठान को करते है। जन्म के बाद कुछ समय सीमा तक शिशु को घर से बाहर नहीं निकाला जाता है। कहा जाता है की इस अवधि मे शिशु के मस्तक पर सूर्य का प्रकाश नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से शिशु के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ सकता है। इससे शिशु की आँखों को नुकसान पहुचने की संभावना होती है। इसलिए जब तक शिशु शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं होता तबतक उसे बाहर नहीं निकालना चाहिए। यह ही निष्क्रमण संस्कार का अर्थ है। 





निष्क्रमण संस्कार करने की विधि 


जैसे की हमने आपको बताया की निष्क्रमण संस्कार का अर्थ है बाहर निकालना। इस संस्कार के दौरान यह ही किया जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान शिशु को पहली बार घर से बाहर निकाल जाता है और सूर्य देव के पहली बार दर्शन करवाए जाते है। जब शिशु की पांच इंद्रियां इस काबिल हो जाती है की वे अच्छे से काम करने लगे और बाहर की धूप और हवा को अच्छे से सहन कर सके, उस समय निष्क्रमण संस्कार करवाया जाता है। इस अनुष्ठान मे सूर्य, चंद्रमा और अन्य देवी देवताओ की पूजा करके शिशु को सूर्य और चंद्रमा के दर्शन करवाए जाते है। अथर्ववेद में इस संस्कार से संबंधित मंत्रों का वर्णन है। 


शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ।

शं ते सूर्य आ तपतुशं वातो वातु ते हृदे। 

शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्या: पयस्वती


अर्थात शिशु के निष्क्रमण के समय सम्पूर्ण देव लोक से लेकर भू लोक तक सभी देवी देवता कल्याणकारी और सुंदरता प्रदान करे। सूर्य का दिव्य प्रकाश शिशु के लिए कल्याणकारी रहे। शिशु के हृदय मे अच्छी वायु का संचार हो। गंगा, यमुना आदि पवित्र नदियों का जल भी तुम्हारा कल्याण करे। 


निष्क्रमण संस्कार के अनुष्ठान के दिन सुबह प्रातःकाल उठकर तांबे के एक बर्तन मे जल भरकर उसमे लालपुष्प की पंखुड़ियां, रोली, गुड, आदि का मिश्रण बनाया जाता है, अथवा उसे सूर्यदेव को अर्घ्य करते हुए बालक को आशीर्वाद दिया जाता है। प्रसाद के लिए सबसे पहले गणेश भगवान, गाय, सूर्यदेव एवं अपने पितरों और कुलदेवताओं के लिए अलग से थाल निकाल ले। इस अनुष्ठान के अनुसार लाल बैल को सवा किलो गेहू और गुड का सेवन करवाए। सूर्यास्त के समय ढलते हुए सूरज को प्रणाम करे और अपने शिशु को आशीर्वाद दे। इसके पश्चात चंद्रमा के दर्शन भी करवाए। 

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